बर्बर जिसका अर्थ प्राचीन समय में अधिक शोर मचाने वाला होता था। प्रारम्भ मै रोमंस साम्राज्य के लोगो ने इस शब्द का प्रयोग उनके आसपास रहने वाली जनजातियों जो सामान्यत काबिले के रूप में रहने वाला खानाबदोश जातिया थी के लिए किया करते थे
बाद मे यही बर्बर शब्द अताताइयो, दुर्जनो तथा असभ्यो के लिए लिया जाने लगा।
अब हम बात करते है आज के समाज की तो विज्ञान मानता है कि मनुष्य प्रारम्भ में बर्बर ही तो था जिसे हम आदिमानव कहते है जो जंगलों में जानवरों की तरह घूमता था शिकार कर कच्चा मांस खाता था।फीर अग्नि का अविष्कार किसी असभ्य मानव(आदि मानव) ने किया इस घटना के बाद वह असभ्य मानव धीरे धीरे सभ्य बन गया लेकिन पिछले कुछ समय से हो रही बलात्कार की घटनाए तथा नन्ही मासूम बच्चियों की नृशंस हत्याएं फिर आभास करा रही है कि आज का सभ्य मनुष्य फिर से बर्बरता की ओर उन्मुख हो रहा है भय का वातावण इस तरह से फैला है कि ऐसा लगता है कि यह सभ्य मानवता फिर से बर्बर दानवों के हाथो में जा रही है।
ऐसा भारत पहली बार नहीं हो रहा है पहले भी कई बार इस धरा पर असभ्य दानवों ने हाहाकार मचाया था लेकिन उस समय उन दानवों पर देविय सभ्य पुरषों तथा नारियों ने शस्त्रों से विजय पाई थी जिन्हें आज हम राम कृष्ण तथा दुर्गा के रूप में पूजते है।
लेकिन दुर्भाग्य इस पुण्य धरा भारत भूमि का की आज इस पावन लोकतांत्रिक भूमि पर लोगो की रक्षा करने वाले रक्षक ही उनकी अस्मिता को ठेस पहुंचाने वाला नर पिशाचों का कुछ नहीं बिगड़ा पा रहे है और कई बार तो रसुक के आगे अपने कर्तव्य को भी ठीक से नहीं निभा पा रहे है,कुछ मामलों में तो खुद रक्षक ही भक्षक देखे गए है।
इस तरह तो समस्त समाज से कानून का भय समाप्त हो जाएगा तथा समस्त सभ्य समाज बड़ी तेजी से सभ्य से बर्बर बन जाएगा और सभ्यता का ढोल पीटने वाले देखते रह जाएंगे तथा नरपिशाच अपना काम करते जाएंगे।
बाद मे यही बर्बर शब्द अताताइयो, दुर्जनो तथा असभ्यो के लिए लिया जाने लगा।
अब हम बात करते है आज के समाज की तो विज्ञान मानता है कि मनुष्य प्रारम्भ में बर्बर ही तो था जिसे हम आदिमानव कहते है जो जंगलों में जानवरों की तरह घूमता था शिकार कर कच्चा मांस खाता था।फीर अग्नि का अविष्कार किसी असभ्य मानव(आदि मानव) ने किया इस घटना के बाद वह असभ्य मानव धीरे धीरे सभ्य बन गया लेकिन पिछले कुछ समय से हो रही बलात्कार की घटनाए तथा नन्ही मासूम बच्चियों की नृशंस हत्याएं फिर आभास करा रही है कि आज का सभ्य मनुष्य फिर से बर्बरता की ओर उन्मुख हो रहा है भय का वातावण इस तरह से फैला है कि ऐसा लगता है कि यह सभ्य मानवता फिर से बर्बर दानवों के हाथो में जा रही है।
ऐसा भारत पहली बार नहीं हो रहा है पहले भी कई बार इस धरा पर असभ्य दानवों ने हाहाकार मचाया था लेकिन उस समय उन दानवों पर देविय सभ्य पुरषों तथा नारियों ने शस्त्रों से विजय पाई थी जिन्हें आज हम राम कृष्ण तथा दुर्गा के रूप में पूजते है।
लेकिन दुर्भाग्य इस पुण्य धरा भारत भूमि का की आज इस पावन लोकतांत्रिक भूमि पर लोगो की रक्षा करने वाले रक्षक ही उनकी अस्मिता को ठेस पहुंचाने वाला नर पिशाचों का कुछ नहीं बिगड़ा पा रहे है और कई बार तो रसुक के आगे अपने कर्तव्य को भी ठीक से नहीं निभा पा रहे है,कुछ मामलों में तो खुद रक्षक ही भक्षक देखे गए है।
इस तरह तो समस्त समाज से कानून का भय समाप्त हो जाएगा तथा समस्त सभ्य समाज बड़ी तेजी से सभ्य से बर्बर बन जाएगा और सभ्यता का ढोल पीटने वाले देखते रह जाएंगे तथा नरपिशाच अपना काम करते जाएंगे।